तुलसीदास जी के दोहे अर्थ सहित I Tulsidas Ke Dohe in Hindi

दोस्तों  आज हम इस तुलसीदास जी के  दोहे (Tulsidas Ke Dohe in Hindi) के बारे में जानेंगे |

तुलसीदास जी के  दोहे (Tulsidas Ke Dohe in Hindi)

भारत दुनिया मे सबसे बड़ा कला का क्षेत्र है। यहाँ हर कला के कलाकार भारी मात्रा में उपलब्ध है। हजार कलाओं के बीच एक कला बेहद अलग हैं और इसे निभाने वाले कलाकार भी दुनिया मे अलग दर्जा प्राप्त करने में सफल रहते हैं। यह कला है कवि। कविता यह कला का वह क्षेत्र है जिसमें व्यक्ति अपने हर तरह के भाव प्रकट कर सकता है जैसे कि किसी विषय पर विरोध करना हो या हास्य व्यंग्य हो या रुलाना हो सभी प्रकार के भाव निकलवाने में कविता और कवि सक्षम है।

tulsidas ke dohe in hindiभारत में भी कई उच्च दर्जे के कवियों ने जन्म लिया जिसमे से तुलसीदास जी का नाम बेहद अव्वल दर्जे पर लिया जाता है। इस पोस्ट के माध्यम से हम आपको तुलसीदास जी के दोहे से रूबरू करवाएंगे। लेकिन उससे पहले तुलसीदास की जीवनी कुछ शब्दों में बयान करना चाहेंगे।

 तुलसीदास जी की जीवनी

तुलसीदास जी का पूरा नाम गोस्वामी तुलसीदास था। साल 1511 में इनके शरीर ने कासगंज, उत्तर प्रदेश में जन्म लिया। हालांकि इनके जन्म स्थान पर कई इतिहासकारों के मतभेद है। कई इनका जन्म स्थान कासगंज की जगह चित्रकूट को बताते हैं। कुछ लोग इनका जन्म गोण्डा जिला के सुकरखेत को भी मानते हैं। इनके मशहूर साहित्य कार्य मे ‘रामचरितमानस’ और ‘हनुमान चालीसा’ प्रमुख है।

तुलसीदास जी के दोहे और उसके अर्थ

तुलसीदास एक महान कवि थे। उन्होंने संस्कृत भाषा में कई कविताएं और दोहे लिखे हैं। तुलसीदास जी ने अपना अधिकतर समय वाराणसी में बिताया और इस वजह से वाराणसी के एक घाट को इनका नाम समर्पित कर दिया गया। आइए जानते हैं इनके कलम के जादू से लिखे गए कुछ दोहे और उसके अर्थ।

तुलसीदास जी के दोहे अर्थ सहित

  • काम क्रोध मद लोभ की जौ लौं मन में खान, तौ लौं पण्डित मूरखौं तुलसी एक समान:- इस दोहे के माध्यम से तुलसीदास जी कहना चाहते हैं कि गुस्सा , क्रोध, लोभ और मोह व्यक्ति के भीतर उतपन्न होते ऐसे नकारात्मक भाव है जिसके कारण एक बुद्धिमान और मूर्ख व्यक्ति में कोई अंतर नहीं रहता। दरअसल यह नकारात्मक भाव व्यक्ति के दिमाग मे गहरा प्रभाव डालते हैं और उनसे सोचने समझने की ताकत छीन लेते हैं। व्यक्ति को इन नकारात्मक भाव से दूर रहना चाहिए।

 

  • सुख हरसहिं जड़ दुख विलखाहीं, दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं, धीरज धरहुं विवेक विचारी, छाड़ि सोच सकल हितकारी:- इस दोहे का अर्थ यह है कि तुलसीदास जी कहते हैं कि जो व्यक्ति सफलता में जरूरत से ज्यादा खुशी और असफलता में जरूरत से ज्यादा दुखी रहता है वह व्यक्ति मूर्ख है। बल्कि उसे यह समझना चाहिए कि यह दोनों एक सिक्के के दो रूप है। जीवन में कभी सफलता तो कभी असफलता मिलती है। लेकिन असल मे सफल व्यक्ति वही होता है जो दोनों पल को एक समान जिए।

 

  • करम प्रधान विस्व करि राखा, जो जस करई सो तस फलु चाखा:- इस दोहे से तुलसीदास जी कर्म अर्थात कार्य का महत्व बताना चाहते हैं। व्यक्ति का कर्म ही उसे महान और मूर्ख के बीच का अंतर समझाता है। यहाँ कर्म व्यक्ति के 9- 5 बजे वाली जॉब को नही कहा गया है। यहाँ कर्म का अर्थ है आपके व्यवहार से । व्यवहार किसी दूसरे शख्स से। जो जिसके साथ जैसा पेश आता है बाद में वैसा ही फल उसे मिलता है।

 

  • तुलसी देखि सुवेसु भूलहिं मूढ न चतुर नर, सुंदर के किहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि:- इस दोहे से तुलसीदास जी का तातपर्य यह है की सुंदरता व्यक्ति को मूर्ख बनाने में काफी कारगर रहती है। लेकिन हर व्यक्ति की बाहर की सुंदरता और अंदर की सुंदरता दोनों चरित्र में भिन्नता होती है। हर व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति के भीतर की सुंदरता से प्रेम करना चाहिए न कि बाहर की सुंदरता।

 

  • तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहुँ ओर, बसीकरन इक मंत्र है परिहरू बचन कठोर:- यह दोहा समाज के सत्य को दर्शाता है। अर्थात हर व्यक्ति को मीठे वाणी बोलनी चाहिए इसकी सहायता से वह किसी भी व्यक्ति को अपना मित्र बना सकता है। खराब वाणी हमेशा दोस्ती में खटास पैदा करती है।

 

  • दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान, तुलसी दया न छोडिये जब तक घट में प्राण:- इस दोहे से कवि तुलसीदास जी कहना चाहते हैं कि हर व्यक्ति को अपने भीतर दया भाव को बचा कर रखना चाहिए जब तक व्यक्ति के प्राण है। दया भाव से व्यक्ति किसी भी इंसान के भीतर प्रेम भावना को जाग्रत कर सकता है।

 

  • ‘तुलसी’ जे कीरति चहहिं, पर की कीरति खोड़। तिनके मुंह मसि लागहैं, मिटिहि न मरिहै धोड़।।इस दोहे में तुलसी दास जी कहते हैं जो दूसरों की बुराई करके खुद आगे बढ़ना चाहते हैं वो कभी भी आगे नहीं बढ़ नहीं पते बल्कि खुद अपनी प्रतिष्ठा बैठते हैं। ऐसे लोगों के मुँह पर ऐसा कलंक लगेगा जो कितना भी कोशिश करे कभी नहीं मिटेगा|
  • तनु गुन धन महिमा धरम, तेहि बिनु जेहि अभियान। तुलसी जिअत विडम्बना, परिनामहु गत जान।।अर्थ- इस दोहे में तुलसी दास जी कहते हैं कि जिनके पास तन की सुन्दरता, सदगुण, धन, सम्मान और धर्म आदि कुछ न होने के बिना भी जिनको अपने ऊपर बहुत घमंड है ऐसे लोगों का जीवन ही विडम्बना से भरा हुआ है, जिसका परिणाम अंत में बुरा ही होता है।

 

  • वचन वेष क्या जानिए, मनमलीन नर नारि। सूपनखा मृग पूतना, दस मुख प्रमुख विचारि।।: इस दोहे में तुलसी दास जी कहते हैं कि मनुष्य की वाणी की मधुरता और उसके वस्त्रों की सुन्दरता से किसी भी पुरूष अथवा नारी के मन के विचारों का अनुमान नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि मन से मैले सुपनखा, मरीचि, पूतना और दस सर वाले रावण के वस्त्र बहुत ही सुन्दर थे।

 

  • राम नाम मनिदीप धरू जीह देहरीं द्वार। तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर।।: तुलसी दास जी कहते हैं कि जो लोग अपने मन के अन्दर और बाहर दोनों और खुशाली देखना चाहते हैं तो उन्हें अपने द्वार अर्थात मुख और देहलीज अर्थात जीभ पर प्रभु राम का गुणगान करना चाहिए |

 

  • नामु राम को कलपतरू कलि कल्यान निवासु। जो सिमरत भयो भाँग ते तुलसी तुलसीदास।।
    तुलसिदास जी कहते है कि भगवन राम का नाम कल्पवृक्ष के जैसा मोक्ष दिलाने वाला मुक्ति का मार्ग है जिसके स्मरण से ही तुलसीदास सा तुच्छ तुलसी के समान पवित्र हो गया।

 

  • तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर। सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि।।:  तुलसी दास जी कहते हैं कि मनुष्य को सुंदर वेष भूषा देखकर न केवल मूर्ख अपितु बुद्धिमान मनुष्य भी धोखे में आ जाते हैं। अब सुंदर मोर को ही देख लो, वो कितना मीठा बोलता है लेकिन वो खाता साँप है।

 

  • सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु। विद्वान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु।।: शूरवीर लोग युद्ध में अपने कौशल के द्वारा अपना परिचय दिया करते हैं, उन्हें खुद का बखान करने की आवश्यक्ता नहीं होती और जो अपने आप अपना कौशल बखान करते हैं, वे कायर कहलाते हैं।

 

  • सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि। ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकति हानि।।: इस दोहे में तुलसीदास जिंकते है की जो मनुष्य शरण में आये मनुष्य को अपने निजी स्वार्थ के लिए छोड़ देते हैं वे क्षुद्र पाप के भागीदर होते हैं। उनको तो देखना (दर्शन ) तक नहीं चाहिए|

 

  • दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान। तुलसी दया न छांड़िए, जब लग घट में प्राण।।
    इस दोहे में तुलसीदास जी कहते हैं कि धर्म का मूल भाव ही दया है, इसलिए दया कभी नहीं छोड़नी चाहिए। इसके विपरित अहंकार समस्त पापों की जड़ होता है।

 

  • सहज सुहृद गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि। सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि।।
    इस दोहे में तुलसीदास जी कहते हैं कि जो मनुष्य सच्चे गुरू के आदेश अथवा सीख का पालन नहीं करता। वह अंत में अपने नुकसान को लेकर बहुत पछताता है।

 

  • मुखिया मुखु सो चाहिए खान पान कहुँ एक। पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित बिबेक।।
    इस दोहे में तुलसीदास जी कहते हैं कि मुखिया शरीर के मुख के समान होता है। जिस तरह एक मुख भोजन करके पूरे शरीर का ध्यान रखता है, उसी प्रकार परिवार का मुखिया सभी सदस्यों का ध्यान रखता है।

 

  • सचिव बैद्य गुरू तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस। राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।।
    इस दोहे में तुलसीदास जी कहते हैं कि मंत्री, बैद्य और गुरू ये तीनों यदि भय या लाभ की आशा से (हित की बात न कहकर) प्रिय बोलते हैं तो राज्य, शरीर और धर्म इन तीनों का शीघ्र की नाश हो जाता है।

 

  • तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहुँ ओर। बसीकरन इक मंत्र है परिहरू बचन कठोर।।
    इस दोहे में तुलसीदास जी कहते हैं कि मीठे वचन सब ओर सुख फैलाते हैं। किसी को भी वश में करने का यह सबसे अच्छा मंत्र है। इसलिए मानव को चाहिए कि कठोर वचन छोड़कर मीठा बोलने का प्रयास करें।

 

  • आवत ही हरषै नहीं, नैनन नहीं सनेह। तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसे मेह।।
    इस दोहे में तुलसीदास जी कहते हैं कि जिस जगह आपके जाने से लोग प्रसन्न नहीं होते हों, जहाँ लोगों की आँखों में आपके लिए प्रेम या स्नेह ना हो, वहाँ हमें कभी नहीं जाना चाहिए, चाहे वहाँ धन की बारिश ही क्यों न हो रही हो।

 

  • तुलसी साथी विपत्ति के, विद्या विनय विवेक। साहस सुकृति सुसत्यव्रत, राम भरोसे एक।।
    इस दोहे में तुलसीदास जी कहते हैं कि किसी विपत्ति यानि किसी बड़ी परेशानी के समय आपको ये सात गुण बचाएंगे- आपका ज्ञान या शिक्षा, आपकी विनम्रता, आपकी बुद्धि, आपके भीतर का साहस, आपके अच्छे कर्म, सच बोलने की आदत और ईश्वर में विश्वास।

 

  • तुलसी नर का क्या बड़ा, समय बड़ा बलवान। भीलां लूटी गोपियाँ, वही अर्जुन वही बाण।।
    इस दोहे में तुलसीदास जी कहते हैं कि समय बड़ा बलवान होता है। वो समय ही है जो व्यक्ति को छोटा या बड़ा बनाता है। जैसे एक बार जब महान धनुर्धर अर्जुन का समय खराब हुआ तो वह भीलों के हमले से गोपियों की रक्षा नहीं कर पाए।

 

  • तुलसी भरोसे राम के, निर्भय हो के सोए। अनहोनी होनी नहीं, होनी हो सो होए।।
    इस दोहे में तुलसीदास जी कहते हैं कि ईश्वर पर भरोसा रखिए और बिना किसी भय के चैन की नींद सोइए। कोई अनहोनी नहीं होने वाली और यदि कुछ अनिष्ट होना ही है तो वो होकर ही रहेगा। इसलिए व्यर्थ की चिंता छोड़ अपना काम कीजिए।

 

  • तुलसी इस संसार में भांति-भांति के लोग। सबसे हँस मिल बोलिए, नदी नाव संयोग।।
    इस दोहे में तुलसीदास जी कहते हैं कि इस दुनियाँ में हर तरह के स्वभाव और व्यवहार वाले लोग रहते हैं। आप हर किसी से प्रेमपूर्वक मिलिए और बात कीजिए। जिस प्रकार नाव नदी से मित्रता कर आसानी से उसे पार कर लेती है, वैसे ही अच्छे व्यवहार से आप भी इस भव सागर को पार कर सकते हैं।

 

  • लसी पावस के समय, धरी कोकिलन मौन। अब तो दादुर बोलिहं, हमें पूछिह कौन।।इस दोहे में तुलसीदास जी कहते हैं कि बारिश के मौसम में मेंढकों के टर्राने की आवाज इतनी अधिक हो जाती है कि कोयल की मीठी बोली उस कोलाहल में दब जाती है| इसलिए कोयल मौन धारण कर लेती है| यानि जब मेंढक रुपी धूर्त व कपटपूर्ण लोगों का बोलबाला हो जाता है तब समझदार व्यक्ति चुप ही रहता है और व्यर्थ ही अपनी उर्जा नष्ट नहीं करता|

 

  • काम क्रोध मद लोभ की, जौ लौं मन में खान| तौ लौं पण्डित मूरखौं, तुलसी एक समान||
    तुलसीदास जी कहते हैं, जब तक व्यक्ति के मन में काम, गुस्सा, अहंकार, और लालच भरे हुए होते हैं तब तक एक ज्ञानी और मूर्ख व्यक्ति में कोई भेद नहीं रहता, दोनों एक जैसे ही हो जाते हैं|

आज की पोस्ट के माध्यम से आपने जाना तुलसीदास जी के दोहे (Tulsidas Ke Dohe in Hindi)के बारे में। आशा करते है की आपने इस लेख के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त की होगी।

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