Vat Savitri Vrat Katha in Hindi | वट सावित्री व्रत कथा और विधि

Vat Savitri Vrat Katha in Hindi | वट सावित्री व्रत कथा और विधि

Vat Savitri Vrat, हमारे भारतवर्ष में अनेक प्रकार के व्रत पर्व आज के करने की मान्यता है जैसा कि हम सबको पता है हमारा पूरा भारत वर्ष में आए दिन अनेक त्यौहार होते रहते हैं दोस्तों आज हम आपको सावित्री व्रत कथा यशोमती का भारत में प्रमुख पर्व है फिर भी सभी प्रकार की स्त्रियां विभा कुमारी विधवा से करती हैं इस व्रत को करने का विधान त्रयोदशी से पूर्णिमा अमावस्या तक है आजकल आवश्यक है इसका आयोजन एवं किया जाता है इस दिन बरगद वृक्ष का पूजन होता है अपने पति की मंगल कामना के लिए करती हैं

इस दिन सत्यवान सावित्री की पूजा की जाती है स्त्रियों का सुहाग अमर होता है ऐसी मान्यता है इसके प्रभाव से अपने हाथों से मुक्त कराया था हमको ज्ञात है सावित्री पटकथा की कथा के बारे में जानकारी देने के जा रहे हैं Vat Savitri Vrat की विधि इस दिन स्त्रियां बड़े सवेरे स्नान करती हैं घर की साफ सफाई और झाड़ू पोछा अपने केशव बालों को धोती है प्रातः काल स्नानादि के पश्चात बांस की टोकरी में रेत भरकर ब्रह्मा जी की मूर्ति की स्थापना करनी चाहिए और सावित्री की मूर्ति स्थापित करनी चाहिए

Vat Savitri Vrat Katha in Hindi | वट सावित्री व्रत कथा और विधि

चौक मूर्ति की स्थापना करने के बाद ब्रह्मा सावित्री के पूजन के पश्चात सावित्री सत्यवान की पूजा करके बड़ की जड़ में पानी देना चाहिए जल मौली रोली कच्चा धागा भिगोया हुआ चना गुड़ फूल तथा धूप दीप से पूजन करना चाहिए उसके चारों और परिक्रमा करना चाइये  कच्चा धागा लपेटकर तीन बार परिक्रमा करनी चाहिए बट सावित्री कथा में मन गया है, दोस्तों ऐसी मान्यता है कि बर्ड के पत्तों के गहने पहनकर वट सावित्री की कथा सुननी चाहिए भीगे हुए जनों का बयाना लेकर हमें जनों के ऊपर रखकर और पत्तों को एक साथ लपेट कर हमको भगवान के पैर छूने चाहिए

मतलब पेड़ के वटवृक्ष के चरण स्पर्श करना चाहिए यदि हमारी सास हमसे दूर है तो उनसे हां कह कर उनको वहां पर चले जाना चाहिए अतः इस पूजा के दौरान प्रतिदिन हम लोगों को पान और सिंधु तथा कुमकुम से सुभाष ने स्त्री के पूजन का भी विधान किया गया पूजा हो जाने के बाद व्रत का फल बहुत ही लाभदायक होना चाहिए और ब्राह्मणों और उनके वस्त्र तथा फल सारी वस्तुओं को एक बाप के पत्र में पात्र में रखकर दोस्तों हमें  कन्यादान या किसी व्यक्ति को दान करनी चाहिए।

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पूजा की समाप्ति पर व्रत के फल दायक होने के लक्ष्य से ब्राह्मणों को तथा कन्याओं को वस्त्र फल आदि वस्तुएं पास के पात्र में रखकर दान करनी चाहिए यदि आपके आसपास बढ़ का कोई पेड़ ना हो तो निराश ना हो कहीं से मंगा लें अथवा उस पर बट वृक्ष को अंकित करके पूजा करें आस्था होनी चाहिएपूजन आराधन के मुख्य मुख्य महत्व भावना श्रद्धा विश्वास और आस्था रखती है अतः आप दीवार पर बड़ के पेड़ का अंकन करें या वास्तविक व्रत का पूजन करें इससे कोई अंतर नहीं पड़ता है

यह व्रतियों द्वारा अखंड सौभाग्य की कामना से किया जाता है यह पूर्वी भारत में हर जगह किया जाता है इस दिन सुंदर वस्त्र धारण करके आभूषण धारण करती हैंइंसान एवं मिट्टी से सावित्री सत्यवान भविष्य की यमराज यमराज की प्रतिमा बनाकर धूप चंदन दीपक उप्पल रोली के सर से पूजन करना चाहिए Vat Savitri Vrat कथा सत्यवान की कथा सुननी चाहिए सावित्री सत्यवान की कथा बहुत समय पूर्व राष्ट्रपति नामक एक परम ज्ञानी राजा थे

उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए पत्नी सहित सावित्री देवी का पूजन करने के पिता पति के साथ घरों में पुत्री होने का वर प्राप्त किया उनका जन्म हुआ सावित्री बढ़ती हुई अपने मंत्री के साथ उन्होंने अपने पति का चयन करने के लिए भेज दिया एक दिन महाराजा यहां आए थे तभी सावित्री अपने मन की बात नाराज से पूछने लगी उसने कहा राजा सेन का राज्य काफी बड़ा है जो अंधे होकर पत्नी सहित बनो की खाक छान रहे हैं उन्हीं के इकलौते आज्ञाकारी आज्ञाकारी पुत्र सत्यवान को पति रूप में करती हूं तीनों लोकों में भ्रमण करने के कारण नाराजी ने सत्यवान कथा सावित्री के ग्रहों की गणना करके भूत भविष्य वर्तमान आज को देखकर राजा को सुनाया तुम्हारी कन्या में निशान देवहारी परिश्रम किया है

सत्यवान * बता धर्मात्मा महान पुरुष है वह सावित्री के लिए सभी प्रकार योग्य है परंतु एक * धर्मात्मा है मैं सावित्री के लिए सरकार से योग्य है और 1 वर्ष के पश्चात सावित्री 12 वर्ष की हो जाएगी सत्यवान परलोक सिधार जाएगा उनकी भविष्यवाणी राजा ने अपनी पुत्री को खोजने को कहा पर खोजने के लिए विवश किया था सावित्री ने पिताजी को उत्तर दिया पिताजी आ जाएं जीवन में एक ही बार अपने पति का चयन करती हैं मैंने भी स्वीकार कर लिया मैं किसी प्रकार भी उनको अपने स्थान के लिए स्थान नहीं रख सकती सावित्री अपना एक बार आजा एक बार ही आता है एक बार ही प्रतिज्ञा करते हैं तथा कन्यादान भी एक बार ही पिता करता है अब चाहे उनकी होगा

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राजा ने सावित्री के ऐसे ब्लड वचन सुनकर प्राचार्य पति ने उसका विवाह सत्यवान से ही कर दिया सावित्री ने नारदजी से सत्यवान की मृत्यु का समय याद कर लिया था सावित्री अपने पति और सास-ससुर की भली बात बन में रहकर सेवा करने लगी समय बीतता गया आखिरकार सावित्री 12 वर्ष की हुई नारद जी का भजन सावित्री को दिन अधीर करता रहा आखिर जब नाराज जी के कथा कथा अनुसार उसके पति के जीवन के 3 दिन बचे तभी से वह उपवास करने लगी उपवास करते हुए

नारद द्वारा कथित निश्चित पितरों का पूजन किया प्रतिदिन की भांति सत्यवान सावित्री बढ़िया लेने के लिए गए सास ससुर से आज्ञा लेकर उनके साथ बीजंगल में सत्यवान सावित्री को मीठे मीठे फल पिला कर दिए और स्वयं एक बचपन लकड़ियां काटने के उजड़ गया व्रत पर चढ़ते ही सत्यवान के सर में असहनीय दर्द होने लगा व्याकुल हो गया से नीचे उतर आया सावित्री ने उसे के पास बस के नीचे लिटा कर अपनी जान रख लिया सावित्री का भविष्य समझ गई

उसी समय से आते हुए सावित्री ने यमराज उसके धर्मराजउसी समय दक्षिण दिशा से देवता आते हुए दिखाई दिए यमराज और उसके दूध सत्यवान के जीव को जब लेकर चल दिए तो सावित्री ने भी यमराज का पीछा करना शुरू कर दिया सावित्री पीछे आई यमराज ने उसे जाकर वापस लौट जाने के लिए कहा सावित्री ने यमराज के पत्नी सकता है कि उसका पति के पीछे जाना है इस्त्री का धर्म है पतिव्रत निभाते हुए सावित्री यमराज के पीछे जाने लगी इसके कुछ भी बोलना आपके लिए तो नहीं रहेगा

सावित्री  ने यमराज का पीछा नहीं छोड़ा इस पर यमराज ने वर मांगने के लिए कहा यमराज का पीछा करते हुए सावित्री ने बर पाली A7 अपने साथ ससुर का राज्य एवं उनका समय आंखों की ज्योति भी मांगने तथास्तु कह दिया फिर भी सावित्री ने यमराज का पीछा नहीं छोड़ा यमराज के पीछे होली यमराज आगे बढ़ने से रोक कर वापस जाने जाने के लिए कहा इस पर सावित्री ने कहा मुझे अपने पतिदेव के पीछे चलने में कोई परेशानी नहीं पति के बिना नारी जीवन की कोई सार्थकता नहीं हम पति पत्नी कैसे जा सकते हैं और मेरे पति जाएंगे वही गम है पति का अनुकरण करना ही मेरा सौभाग्य स्त्री का कारण है

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सावित्री यमराज ने सावित्री अधर्म को देखकर मांगने के लिए मांगने के लिए कहा सावित्री ने अपने ससुर के राज्य प्राप्ति और भाइयों की मांग लिया पर देने के बाद यमराज ने सावित्री को वापस लौट जाने को कहा किंतु सावित्री अपने अधिक रही तब यमराज बोले देवी में अभी भी कोई काम ना है तो बर मांगिए मुंह मांगा सावित्री ने देवता से कहा है तो आप सच्चे से मुझे भर देना ही चाहते हैं तो मुझे दो पुत्रों की मां बनने का वरदान दें यमराज ने पीछे मुड़कर देखा और सावित्री से कहा अब आगे मत बढ़ो तुम्हें मरते तथास्तु कह दिया सावित्री नम्रता पूर्वक धर्मराज आपने मुझे पुत्रवती होने का वर तो दे दिया पर आप मेरे पति को तो अपने प्राणों को साथ में लिए जा रहे हैं

अब मैं पुत्रवती कैसे होंगीइस प्रकार सावित्री ने यमराज से कहा अब आप मेरे पति को वापस कर दीजिए मैं पुत्रवती कैसे होंगी मुझे मेरा पति वापस मिलना चाहिए मुझे मेरा पति वापस मिलना चाहिए सावित्री की धर्म निष्ठा पति भक्ति आज से प्रसन्न हो यमराज ने शक्तिमान को पास से मुक्त कर दिया सावित्री कोहबर देकर यमराज अंतर्धान हो गये उसी दिन से बट सावित्री की व्रत कथा का प्रचलन हो गया सावित्री अपने वापस आकर ससुर के साथ राज्य एवं पुत्रों से संपन्न हो अपने पति सत्यवान सत्यवान के साथ जीवन यापन करने लगी इसी प्रकार की कथा Vat Savitri Vrat की कथा पूर्ण हुई

 

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